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कम्प्यूटर दीदी रेखा.........
08-May-2015
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नीमच जिले के पास एक छोटा सा गाँव है कुचडोद। यहां हाई स्कूल की पढाई के लिये 6 कि.मी. दूर कस्बा जीरण जाना पडता है। ये कहानी कुचडोद की दो सखियाँ रेखा धनगर और संगीता धनगर की है, दोनो पक्की सहेलियां और पक्के इरादो वाली सखियां।

म.प्र. का नीमच जिला राजस्थान की सीमा पर स्थित है। यहां पिछडापन, गरीबी और बाल विवाह की समस्या है। वहीं के गाँव कुचडोद की धनगर बस्ती में रहनेवाली रेखा और संगीता की पढ़ाई आठवी के बाद रूक गयी। 15 वर्ष की उम्र में विवाह भी हो गया, गनीमत यह कि गौना नहीं हुआ।

दोनो सहेलियां कुछ करना चाहती थीं। दोनों गाँव की आँगनवाड़ी कार्यकर्ता सोहन भाभी से मिलती रहती थीं। उन्हीं से अपनी व्यथा बांट लेती थी। सोहन भी क्या करती, वह जानती थी इस छोटे से गाँव में रीति रिवाजों की जकड़न है। चाहकर भी वो इन लडकियों की कोई मदद नही कर पा रही थी, हां उसके मन मे छटपटाहट जरूर थी।

नीमच जिले मे आई ‘‘सबला‘‘ योजना से मानो सोहन, रेखा और संगीता की मुराद पुरी हो गई। सुपरवाइजर जयंत मेडम ने उनको बताया कि महिला बाल विकास विभाग ने उनके जैसी शालात्यागी लड़कियों का समूह बनाकर उन्हे ‘‘सबला‘‘ बनाने की योजना बनायी हैं।

कुचडोद मे समूह बनाने के लिये रेखा और संगीता ने सोहन भाभी के साथ शालात्यागी लडकियों और नवब्याहताओं से बात की तो सभी के घरवालो ने साफ मना कर दिया। जवान लड़कियों को इतनी आजादी देना गाँव मे किसी को मंजूर नहीं था। पालकों को लगा कि इसका कोई मतलब भी नही है कौन सी उनकी बेटी अफसर बन रही थी, आखिर उसे तो ससुराल मे रोटी पकानी थी। पर सोहनबाई की कोशिशों से आखिर गाँव मे सखी सहेली समूह बना। बैठकें हुई और समूह पंजीकृत हुआ ।

रेखा और संगीता नीमच मे होने वाली ट्रेनिंग मे आईं। अन्य गाँवों की सखियों से मिली, कोर्ट गयी, थाना देखा, वकील मेडम से मिली कुछ सवाल पूछे। उन्हें काम करते हुए देखा। कभी बैंक मे गईं, वहां काम का तरीका जाना, बैंक की मेडम से जानकारी ली ओर जाना की ‘‘अरे ये दुनिया तो बहुत बडी है‘‘

गाँव जाकर यही बातें पूरे समूह से साझा की। सभी सदस्यों को बताया कि अपनी शिक्षा पूरी करो। उनका व्यक्तित्व और आत्मविश्वास देखकर सभी सदस्य सहेलियां पे्ररित हुई। सबला समूह ने आकार लेना आरंभ किया। समूह की सखियां-सहेलिया बढ़ती गईं। सभी बालिकाओं ने कोर्ट, पुलिस थाना, कॉलेज, कम्प्यूटर, शिक्षा, आंगनवाड़ी स्वास्थ्य विभाग के कामो को जाना, सभी की हिम्मत खुली।

नीमच में व्यक्तित्व विकास की क्लास में 3 दिन की ट्रेनिंग से उनकी जिंदगी में नया मोड़ आया। रेखा और संगीता ने अपनी रूकी पढ़ाई शुरू कर दी। रेखा बी.ए. द्वितीय वर्ष की परीक्षा दे रही है और संगीता 12 वी की पढ़ाई कर रही है। उन्होंने नीमच सबला योजना में कम्प्यूटर का डिप्लोमा किया। अब वह गाँव में मात्र 100 रूपए फीस लेकर कम्प्यूटर चलाना सिखाती हैं। सारा गाँव उसे कम्प्यूटर दीदी के नाम से जानता है।

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