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ताइक्वांडो वाली लड़की
05-May-2015
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समाज में अब भी लड़कियों के जन्म पर परिवार में कई बार खुषी नहीं मनाई जाती। पूजा भी जब पैदा हुई तो परिवार की बुजुर्ग महिलाओं ने उसे दुलारा नहीं, लेकिन पूजा पर अब परिवार गर्व करता है। उसने बता दिया है कि लड़कियां किसी से कम नहीं।

इंदौर शहर में रहने वाले परिवार में चार-भाई बहनों में पूजा सबसे छोटी है। जब पूजा का जन्म हुआ तब परिवार में पुत्र जन्म की कामना थी किन्तु कन्या शिशु होने पर परिवार की बुजुर्ग महिलाओं की उपेक्षा मिली। पूजा के माता-पिता लड़के और लड़की में अंतर नहीं करते थे। उन्होंने पूजा को भी किसी लड़के की तरह ही प्यार-दुलार दिया। परिवार की गरीब परिस्थिति होने के बावजूद उन्होंने उसकी पढ़ाई करवाई।

पूजा के माता-पिता मजदूरी करते थे। माता ने कुछ दिन मजदूरी पर जाना छोड़ा, साथ ही पूजा का नाम आँगनवाड़ी केन्द्र में जुडवाया। जन्म के बाद पांच वर्ष तक पूजा आँगनवाड़ी केन्द्र में निरंतर उपस्थित रही। बाद में यही किशोरी बालिका आँगनवाड़ी के नियमित कार्यो में सहभागी बनने लगी। पढाई के साथ-साथ पूजा ने ताइक्वांडो में दक्षता हासिल की। उसने तय किया कि वह एक दिन ताइक्वांडो का गोल्ड जरूर जीतेगी।

पूजा आँगनवाड़ी की सबला योजना से जुडकर किशोरी क्लब की सदस्य बनी और मंगल दिवस पर नियमित रूप से आँगनवाड़ी में उपस्थित होने लगी। व्यक्तिगत स्वच्छता, उचित पोषण, किशोरी स्वास्थ्य की जानकारी लेकर पूजा एक स्वस्थ किशारी बनी।

पूजा की मेहनत रंग लाई। उसने ताइक्वांडो में राष्ट्रीय उपलब्धि हासिल कर स्वर्ण पदक प्राप्त किया। उसने यह साबित किया कि लड़कियां किसी से कम नहीं।

पूजा अब जान गई है कि एक समुदाय में आँगनवाड़ी जैसी संस्था कितनी मददगार साबित हो सकती है। बचपन से लेकर किषोरावस्था तक आँगनवाड़ी की योजनाओं का जो फायदा उसे मिला वह उसे जीवन में बड़ा काम आया। यदि ऐसा नहीं होता तो एक मजदूर की बेटी ताइक्वांडो की सफल खिलाड़ी न बनती।

लक्ष्मी ने मां को बेसहारा नही होने दिया। मां सीता की मदद के लिये लक्ष्मी ने हाथ आगे बढाया। सोनांचल बस स्टैण्ड के सामने शाम को मां- बेटी मिलकर पिता के ठेले पर चाय-समोसा बेचने लगी। यही नही न सिर्फ उसने अपनी, बल्कि अपने भाई बहन की शिक्षा से लक्ष्मी ने समझौता नहीं किया। आज उसका 12 वर्षीय भाई भीम कक्षा 7 में तथा दीपा व दीपक चैथी कक्षा मे सरकारी स्कूल सीधी खुर्द मे पढ रहे हैं । सुबह घरेलू काम-काज के बाद वह पहले भाई बहन को स्कूल भेजती व फिर खुद नियमित रुप से कक्षा 10 मे कन्या विद्यालय जाती है, और शाम को ठेले पर मां का हाथ बटाती हैं।

लक्ष्मी कहती है पिता की नषे की लत के कारण नजदीकी रिश्तेदार पहले ही दूर हो गए थे। उनकी मौत के बाद हमारा परिवार अत्याधिक गरीबी की स्थिति में था। परिवार को खाने-पीने के संसाधन उपलब्ध नही थे, लेकिन सबला योजना के जीवन कौशल के प्रषिक्षण मे मुझे कुछ और बेहतर करने की प्रेरणा मिली। हमारे हक एवं जिम्मेदारियां एवं कुछ नया सोचे एवं नया करने की प्रेरणा ने मुझमे आत्मविश्वास पैदा किया मुझे फक्र है कि मै अपनी मां को समाज मे सम्मानपूर्वक जीवन यापन करने तथा अपने छोटे भाई बहनो को शिक्षित कर पा रही हूं।

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